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आईआईटी खड़गपुर का आदर्श वाक्य है “योगः कर्मसु कौशलम्”। इस आदर्श वाक्य का वास्तविक अर्थ है “कर्म में उत्कृष्टता ही योग है”, जिसका मूल तात्पर्य है कि अच्छी तरह से अपना कार्य करना ही (सत्यतः) योग होता है। इसका मूल स्त्रोत भागवद् गीता में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिया गया उपदेश है। गीता के महासंदर्भ में यह उक्ति मानव को स्थिर-चित्त प्राप्ति की ओर प्रेरित करती है, क्योंकि ऐसी स्थिर-चित्त आत्मा ही संसार में अच्छे या बुरे कर्मों के फलों का परित्याग करने में सक्षम हो पाती हैं। स्थिर-चित्तता ही कायिक कर्मों में पूर्णता का स्त्रोत होती है एवं अंततः मोक्षगामी होती है।  


यह संस्थान देश के प्रत्येक नागरिक के जीवन के प्रति समर्पित है और संसार में सर्वोत्तम के तौर पर स्वीकृति हेतु प्रयासरत है। इस संस्थान का प्रत्येक प्रयास देश के हित की ओर केन्द्रित होता है।
1. व्यापक स्तर पर शिक्षा प्रदान करना, जिसमें छात्रों को उनकी व्यावसायिक निपुणता विकसित करने के लिए प्रेरित किया जाता है।

2. विज्ञान, तकनीकी, प्रबंधन एवं विधि के क्षेत्रों के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञों को समाहित कर छात्रों को परियोजनाओं की परिकल्पना, सृष्टि एवं क्रियान्वयन का पूर्ण प्रशिक्षण देना।

3. उत्तीर्ण होने वाले छात्रों में उद्यमशीलता एवं अभिनवता की भावना प्रस्फुटित करना।

4. उद्योग, शिक्षा एवं समाज से संबंधित क्षेत्रों में प्रायोजित अनुसंधान एवं सलाहकारिता का कार्य करना।


1. शिक्षा एवं अनुसंधान में उत्कृष्टता का केन्द्र बनकर विज्ञान, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन के क्षेत्रों में विश्वस्तर पर भावी नेतृत्व का सृजन करना।

2. एक ऐसा स्थान बनना जहाँ पर राष्ट्रीय एवं विश्वस्तर के अग्रणी क्षेत्रों में ज्ञान की सृष्टि होती हो।


आईआईटी प्रणाली के इतिहास का प्रारम्भ सन 1946 में हुआ जब वायसराय की कार्यकारी समिति, शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कृषि विभाग के सदस्य माननीय सर जोगेन्द्र सिंह ने युद्धोपरान्त भारत में औद्योगिक विकास हेतु उच्च-स्तरीय तकनीकी शिक्षा संस्थानों की स्थापना करने हेतु एक समिति गठित की थी। श्री एन. आर. सरकार के नेतृत्व में इस 22 सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण क्षेत्रों में कुल चार उच्च-स्तरीय तकनीकी शिक्षण संस्थानों की स्थापना करने की सिफारिश की थी, जो कि मैसाच्युसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, यूएसए के तर्ज पर थी जिससे अनेक माध्यमिक संस्थान संबद्ध थे । रिपोर्ट में शीघ्र ही इन चारों संस्थानों की स्थापना किए जाने की संस्तुति की थी, विशेषकर पूर्व एवं पश्चिम में स्थापित होने वाले संस्थानों को तत्काल प्रारम्भ किए जाने पर बल दिया था। समिति ने यह भी सोचा कि ऐसे संस्थान न केवल स्नातक तैयार करेंगे, बल्कि उन्हें साथ में अनुसंधान कार्य करना होगा, अनुसंधानकर्ता एवं प्रौद्योगिकी शिक्षक भी तैयार करने होंगे। स्नातकों का स्तर प्रथम श्रेणी के विदेशी संस्थानों के समतुल्य होना चाहिए। उनका मानना था कि स्नातक एवं स्नातकोत्तर छात्रों का अनुपात 2:1 होना चाहिए। उपरोक्त संस्तुतियों के परिप्रेक्ष्य में पहला भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी), का जन्म मई 1950 में हिजली, खड़गपुर, भारत के पूर्वी क्षेत्र में हुआ। प्रारम्भिक काल में इस आईआईटी ने 5, इस्प्लैनेड ईस्ट, कलकत्ता से अपना कार्य प्रारम्भ किया तथा शीघ्र ही, सितंबर 1950 में हिजली, खड़गपुर में स्थानांतरित हो गया। इसका वर्तमान नाम ‘भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान’, मौलाना अबुल कलाम आज़ाद द्वारा अगस्त 18, 1951 को संस्थान के विधिवत उद्घाटन से पहले ही स्वीकार हो गया था। आईआईटी खड़गपुर ने अपनी यात्रा पुराने हिजली नज़रबंदी शिविर से प्रारम्भ की, जहां पर कई महान स्वाधीनता सेनानियों ने कष्ट सहा तथा देश की स्वतंत्रता के लिए अपने जीवन का बलिदान किया था। इस प्रकार से आईआईटी खड़गपुर का इतिहास हिजली नज़रबंदी शिविर के इतिहास से गहरे जुड़ा हुआ है। यह सम्भवत: विश्व के कुछ ही संस्थानों में से एक है जिसने अपनी यात्रा किसी कारागार परिसर से प्रारम्भ की हो।

नज़रबंदी शिविर के बारे में

बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध से ही मेदिनीपुर जिला सहित बाकी बंगाल ने ब्रिटिश राज के विरुद्ध क्रांतिकारी आंदोलन की गतिविधियों में भाग लिया था।

सशस्त्र क्रांति या असहयोग आंदोलन में भाग लेने वाले असंख्य युवाओं को साधारण कारागारों में रखा नहीं जा सकता था। इसलिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने कुछ नज़रबंदी शिविर स्थापित करने का निर्णय लिया – पहला शिविर बक्सा के किले में बना जिसके बाद ही हिजली नज़रबंदी शिविर सन् 1930 में स्थापित हुआ। हिजली नज़रबंदी शिविर का हमारे स्वाधीनता आंदोलन में एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है। दो शस्त्ररहित नज़रबंदियों की सितंबर 16, 1931 को ब्रिटिश पुलिस द्वारा गोली मार कर हत्या कर दी गई। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस उन दो महान स्वतंत्रता सेनानियों – संतोष कुमार मित्रा एवं तारकेश्वर सेनगुप्ता के शव लेने हिजली आए थे। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर सहित सभी राष्ट्रनेताओं ने इस घटना के लिए ब्रिटिश राज की घोर भर्त्सना की थी। हिजली नज़रबंदी शिविर को सन 1937 में बंद कर दिया गया और इसे फिर से सन 1940 में बिना किसी मुकद्दमे वाले स्वाधीनता संग्रामियों को नज़रबंद करने के लिए खोला गया। सन 1942 में इसे एक बार फिर बंद कर दिया गया और नज़रबंद लोगों को अन्य स्थानों पर भेज दिया गया।

 

आईआईटी का शैशवकाल

जब पहला सत्र अगस्त 1951 में प्राम्भ हुआ तो इसमें 224 फ्रेशर एवं 42 शिक्षक थे। कक्षाओं, प्रयोगशालाओं एवं प्रशासनिक कार्यालय को हिजली नज़रबंदी शिविर के ऐतिहासिक भवन में स्थापित किया गया। संस्थान ने अपना शैक्षणिक कार्यक्रम केवल 10 विभागों से प्रारम्भ किया। मार्च सन 1952 में पंडित नेहरू ने नए भवन की आधारशिला रखी।

 वर्तमान परिसर एवं हमारे भवनों की रूपरेखा विख्यात स्विस आर्किटेक्ट डॉ. वर्नर एम. मोसर के दिशानिर्देश में अनेक इंजीनियरों एवं आर्किटेक्टों द्वारा तैयार की गई। असंख्य मशीनी उपकरणों की प्राप्ति के लिए उद्योग एवं आपूर्ति मंत्रालय से बहुत बड़ी वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई गई थी। इस संस्थान की कार्यशाला देश में सर्वोत्तम कार्यशालाओं में से एक थी। इस संस्थान का सौभाग्य था कि सर जे. सी. घोष, प्रख्यात वैज्ञानिक को इसने अपने पहले निदेशक के तौर पर पाया, जिनके दिग्दर्शन में इसने अपना प्रारम्भिक विकास किया। इसके पहले अधिशासी मण्डल में डॉ. बी. सी. रॉय, अध्यक्ष के रूप में तथा श्री एन. आर. सरकार, सर जहांगीर जे. गांधी, डॉ. ताराचन्द, श्री के. आर. के. मेनन, श्री टी. शिवशंकर, डॉ. एस. एस. भटनागर, श्री एच. कबीर एवं डॉ. जे. सी. घोष सदस्य थे। यूरोप के कई प्रख्यात विद्वान इस संस्थान से इसके प्रारम्भिक दौर में जुड़े तथा उनमें सर्वप्रथम दो थे प्रो. आर. ए. क्राउस एवं प्रो. एच. टिशनर, जो कि सौभाग्यवश इलेक्ट्रॉनिक्स व ईसीई विभाग के सर्वप्रथम विभागाध्यक्ष थे।

 सितम्बर 15, 1956 को भारत की संसद ने एक अधिनियम पारित किया जिसका नाम था भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (खड़गपुर) अधिनियम, जिसके अनुसार इस संस्थान को राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित किया गया। इस संस्थान को एक स्वायत्त विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया। सन 1950 में अपने छोटे से अस्तित्व से प्रारम्भ होकर आईआईटी खड़गपुर 18 शैक्षणिक विभागों व पाँच उत्कृष्टता केन्द्रों सहित विकास की अनवरत प्रक्रिया में लगा हुआ है। वृक्षों से भरे 2100 एकड़ में फैले परिसर में 15,000 वासियों के लिए स्वनिर्भर एक उपनगरीय वातावरण है। वर्तमान में हमारे परिसर में 550 शिक्षक, 1700 कर्मचारी एवं 9000 छात्र हैं।

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